चाँद को निहारु शिव को पुकारू गंगा के किनारे बैठके

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Chaand Ko Niharu Shiv Ko Pukaru Ganga Ke Kinare Baith Ke

चाँद को निहारु शिव को पुकारू
गंगा के किनारे बैठ के

चाँद को निहारु शिव को पुकारू
गंगा के किनारे बैठ के ॥

जीवन को संवरू पार तू उतारे
गंगा के किनारे बैठ के बैठ के
गंगा के किनारे बैठ के॥

भक्त हमारे जीवन से इतने सताए हुए है
टूटे हुए है बिखरे हुए है
कहते है जो गंगा नहाये
तर जाते है सब लोग
अब हमने समझा अब हमने जाना है
क्यों गंगा तीनो लोक ॥

थक गए थे हम दुखो को उठा के
अभी चैन आई अब साँसे
गंगा के किनारे बैठ के
गंगा के किनारे बैठ के ॥

तुम और मैं हर बात में बंदेया
जाना न था साथ में बंदेया
जाने दो जो चला गया
कुछ भी नहीं तेरे हाथ बंदेया ॥

दिल नहीं भरता जितना भी ताके
इतना सुख है गहरी गहरी आँखे
गंगा के किनारे बैठ के ॥

गंगा धराये शिव गंगा धराये
हर हर भोले नमः शिवाये
गंगा धराये शिव गंगा धराये
हर हर भोले नमः शिवाये

सिंगर – सागर

Chaand Ko Niharu Shiv Ko Pukaru Ganga Ke Kinare Baith Ke

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