बिनु सत्संग विवेक न होई

बिनु सत्संग विवेक न होई

Binu Satsang Vivek Na Hoi – Ram Charit Manas Chaupai

पोथी का बोझ भारी
अहंकार की खुमारी
बिनु सत्संग विवेक न होई
बिनु सत्संग विवेक न होई

अक्षरों में ढूँढा रास्ता
राख निकला हर वास्ता
सिर पे चढ़ी थी धूल
कागज़ बने थे शूल

अंगार सा मन ये जले
सच्चा कोई साथ न मिले
बिना सत्संग विवेक कहाँ
बिना कृपा के सुख कहाँ

बिनु सत्संग विवेक न होई
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई
बिनु-बिनु सत्संग
राम-राम कृपा न होई

पन्नों में उलझा रहा
घमंड में जलता रहा
साधु संग जब छुआ
दूर सब अंधियारा हुआ

अंगार सा मन ये जले
सच्चा कोई साथ न मिले
बिना सत्संग विवेक कहाँ
बिना कृपा के सुख कहाँ

बिनु सत्संग विवेक न होई
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई


बिनु-बिनु सत्संग
राम-राम कृपा न होई

सब छोड़ दिया
सिर झुका दिया

बिनु सत्संग विवेक न होई
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई

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