वृन्दावन की इन कुंज गलिन में खुशबु बिहारी जी की आती है
प्रेम सरोवर छाड़ के तूभटके है तू चित्ता की चाह मेंजहा गेंदा गुलाब अनेक खिलेजहा गेंदा गुलाब अनेक खिलेबैठा क्यों काबिल की छावन मेंप्रेमी कहे प्रेम को पंथ यहीरहिबो कर सूधे सुभायन मेंरे मन तोहि मिले विश्राम वहीवृषुभान किशोरी के पायन में ।। ऐसी सुगंध छायी है चाहूँ औररसिको को खींच लेती बाढ़ प्रेम की … Read more