चैन मिले जो कुटिया में ना महल अटारी में

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चैन मिले जो कुटिया में, ना महल अटारी में
जरा खाके देखो
जरा खाके देखो बड़ा मजा मेहनत की रोटी में
जरा खाके देखो बड़ा मजा मेहनत की रोटी में।।

अष्टावक्र का हंसी उड़ाया जनक राज पछताया
क्रोध में आके बोले ऋषि वर नीच का सभा बुलाया
भूल ना जईहे पढ़ पढ़ गुना अटल लंगोटी में
जरा खाके देखो बड़ा मजा मेहनत की रोटी में।।

चैन मिले जो कुटिया में, ना महल अटारी में
जरा खाके देखो बड़ा मजा मेहनत की रोटी में
जरा खाके देखो बड़ा मजा मेहनत की रोटी में।।

सब है ईश्वर आंसी जग में सब के अंदर ईश्वर बा
पग पग दिल में ठोकर मारे भला बुरा परमेश्वर बा
आम के वृक्ष जैसे सिंपल आम के आथि में
जरा खाके देखो बड़ा मजा मेहनत की रोटी में।।

चैन मिले जो कुटिया में, ना महल अटारी में
जरा खाके देखो बड़ा मजा मेहनत की रोटी में
जरा खाके देखो बड़ा मजा मेहनत की रोटी में।।

अब भी समय बा जनम सुधारा मन को बांधो भक्ति से
संत की बात ह्रदय में राखो मुँह ना फेरो भक्ति से
बहुत कीमती समय गया बा अट्ठा गोटी में
जरा खाके देखो बड़ा मजा मेहनत की रोटी में
जरा खाके देखो बड़ा मजा मेहनत की रोटी में।।

चैन मिले जो कुटिया में, ना महल अटारी में
जरा खाके देखो बड़ा मजा मेहनत की रोटी में
जरा खाके देखो बड़ा मजा मेहनत की रोटी में।।

सिंगर – धीरज कांत जी।

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